मेन्स्ट्रुअल साइकल के दौरान वेजाइनल डिसचार्ज में क्या बदलाव आते हैं

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various changes in the vaginal discharge during a menstrual cycle

वेजाइनल डिसचार्ज ज्यादातर हर महिला को होने वाली समस्या है। जिसमें थोड़ा सा भी बदलाव होने पर नोटिस किया जा सकता है। वेजाइनल डिसचार्ज होना सामान्य होता है। वेजाइनल डिसचार्ज में पूरे महीने कुछ ना कुछ बदलाव होते हैं। कभी तो यह सामान्य होता है तो कभी किसी गंभीर समस्या के संकेत देता है। वेजाइनल डिसचार्ज में ओव्यूलेशन के दौरान और उसके बाद भी बदलाव होते हैं। वेजाइनल डिसचार्ज के रंग और मात्रा में भी समय के साथ बदलाव होते रहते हैं इसलिए ओव्यूलेशन के बाद पूरे महीने वेजाइनल डिसचार्ज में होने वाले बदलावों के बारे मे पता होना जरुरी होता है। तो आइए आपको इन बदलावों के बारे में बताते हैं। [ये भी पढ़ें: बिकनी वैक्स करने के बाद क्या करें]

शुरुआती 5 दिनों के दौरान: ओव्यूलेशन के बाद शुरुआती 5 दिनों में वेजाइनल डिसचार्ज बहुत कम होता है। इस दौरान खून के साथ थोड़ा-बहुत डिसचार्ज होता है जिसे ज्यादा नोटिस नहीं किया जा सकता है।

अगले तीन दिनों के दौरान: इस समय में शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल कम हो जाता है। इस दौरान गहरे भूरे रंग का गाढ़ा डिसचार्ज होता है। इसमें पीरियड्स के दौरान शरीर में बचा खून बाहर आता है। जो महिलाएं गर्भधारण करने की सोच रही हो उनके लिए यह सही समय नहीं होता है। गहरे भूरे रंग का खून स्पर्म के रास्ते को ब्लॉक करता है। [ये भी पढ़ें: स्तनपान के दौरान सामान्य ब्रा क्यों नहीं पहननी चाहिए]

9-12 बाद दिन बाद: जब शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ जाता है तो वेजाइनल डिसचार्ज लगातार और चिपचिपा होने लगता है।

अगले 2 दिन: यह मासिक चक्र के सबसे फर्टाइल दिन होते हैं। इस दौरान वेजाइनल डिसचार्ज का रंग अंडे की तरह सफेद होता है। इस समय में शुक्राणु अंडे को निषेचित कर सकता है। अगर आप गर्भधारण करने की सोच रहे हैं तो यह बिल्कुल सही समय होता है।

मासिक चक्र के 28वे दिन से कुछ दिन पहले: जब शरीर में प्रोजेस्ट्रेरोन का सेवन बढ़ जाता है तो यह डिसचार्ज गाढ़ा हो जाता है। जिसकी वजह से इस दौरान शुक्राणु सही जगह पर नहीं जा पाता है।

वेजाइनल डिसचार्ज की यह सभी कंडीशन्स सामान्य होती हैं। अगर डिसचार्ज का रंग हरा या पीला हो तो यह यीस्ट इंफेक्शन के संकेत होते हैं। इसके अलावा दुर्गंध, खुजली और सूजन की समस्या भी हो तो यह किसी इंफेक्शन या बीमारी के संकेत होते हैं। [ये भी पढ़ें: ब्रेस्ट के ढ़ीले हो जाने से जुड़े मिथक और सच]

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