Navratri Special: पहले दिन देवी शैलपुत्री की पूजा का महत्व

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navratri special why we worship goddess shailputri on first day

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नवरात्रि के नौ दिनों में हर दिन मां दुर्गा की पूजा अलग रुप में की जाती है। पहले दिन माँ दुर्गा को ‘शैलपुत्री’ के नाम से माना जाता है। नवरात्रि की शुरुआत देवी शैलपुत्री की पूजा से शुरू होती है। पर्वत राज हिमालय की बेटी होने के कारण इनका नाम शैल पुत्री है। शैलपुत्री को पवित्रता की देवी कहा जाता है। शैलपुत्री की पूजा करते वक्त आप ख़ुद को प्रकृति से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि देवी शैलपुत्री प्रकृति का ही एक रुप हैं। नवरात्रि के पहले दिन देवी शैलपुत्री की पूजा क्यों और कैसे की जाती है, इनकी पूजा का मंत्र क्या है, आइए जानते हैं। [ये भी पढ़ें: नवरात्र स्पेशल: व्रत में सेंधा नमक का सेवन क्यों फायदेमंद है]

Navratri Special: नवरात्रि के पहले दिन का महत्व

इनकी पूजा क्यों की जाती है
नवरात्रि के पहले दिन का महत्व
पूजा विधि
पूजा का मंत्र
अर्थ

इनकी पूजा क्यों की जाती है: देवी शैलपुत्री को स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप माना जाता है। पहले दिन इनकी पूजा करने से साधक अपने मन को मूलाधा चक्र में स्थित करते हैं। शैलपुत्री का पूजन करने से मूलाधार चक्र जागृत होता है और यहीं से योग साधना की शुरुआत होती है। इनकी आराधना से आपको कई प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती है।

नवरात्रि के पहले दिन का महत्व: नवरात्रि के नौ दिनों में जब आप ख़ुद को देवी शक्ति से जोड़ते हैं तो आपके अंदर सकारात्मक उर्जा का आवाहन होता है। देवी शैलपुत्री जो जागरूकता का प्रतीक है साधक को स्वयं के बारे में जागरुक होने के लिए प्रेरित करती हैं। पहले दिन इनकी पूजा आध्यात्मिकता की शुरुआत का प्रतीक है। देवी शैलपुत्री को प्रकृति का दूसरा रुप माना जाता है। इनकी पूजा करते वक्त आप ख़ुद को प्रकृति के करीब पाते हैं और इसके जरिए अध्यात्म से जुड़ने में मदद मिलती है। [ये भी पढ़ें: नवरात्र स्पेशल: व्रत के दौरान नाश्ते में क्या खाना होगा बेहतर]

पूजा विधि: देवी शैलपुत्री की पूजा कलश स्थापना से शुरु होती है। इस कलश को स्थापित करने से पहले इसमें सप्तमृतिका यानि सात तरह की मिट्टी भरी जाती हैं। कलश के नीचे 7 तरह के अनाज और जौ बोएं जाते हैं जिन्हें दशहरा के दिन काटा जाता है। इस अनुष्ठान को जयंती कहते हैं। कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री के आगमन के लिए पूजा की जाती है। फिर शैलपुत्री की मूर्ति को पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है। इनके साथ में लक्ष्मी और श्री गणेश की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। इसके बाद फूलों, चावल, रौली और चंदन के साथ शैलपुत्री की पूजा करें।

पूजा का मंत्र: 

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

अर्थ: माता शैलपुत्री के रूप में देवी दुर्गा की उपासना करने से चन्द्रमा के हर बुरे प्रभाव को दूर करने में मदद मिलेगी जिसे आदी शक्ति का ये रूप शासित करता है। [ये भी पढ़ें: नवरात्र स्पेशल: व्रत में खाया जाने वाला साबुदाना हैं बहुत लाभकारी]

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