दुर्गा अष्टमी 2017: आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा का महत्व

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नवरात्र के पवित्र नौ दिनों में उनके विभिन्न रुपों की पूजा की जाती है। महा अष्टमी के दिन नवदुर्गा के आठवें रुप देवी महागौरी की पूजा की जाती है। नवरात्रि का हर दिन का एक अलग अर्थ है। इसी तरह आठवें दिन के लिए भी है। जब देवी पार्वती भगवान शिव को पाने के लिए प्रयास कर रही थी तब उनका रंग सांवला था। अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए, उन्होंने गंगा से पवित्र जल लिया और उसकी मदद से देवी को नई और स्वच्छ काया मिली। जिसके कारण उन्हें महागौरी कहा जाने लगा। देवी महागौरी की पूजा से भक्त को अशुद्ध हृदय को साफ़ करने में मदद मिलती है। मां महागौरी हरे या सफेद वस्त्र धारण करती हैं। इन्हें श्वेताम्बरधारा भी कहा जाता है। आइए जानते हैं इनकी पूजा कैसे और क्यों की जाती है। [ये भी पढ़ें: नवरात्रि स्पेशल: सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा का महत्व]

इनकी पूजा क्यों की जाती है
नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की पूजा करना बेहद उपयोगी है। उनकी कृपा से आत्मा से सभी अशुद्धियां दूकर हो जाती हैं। वह अपने उपासकों के हृदय से सभी बुराइयों को साफ करती हैं और उन्हें धार्मिक बनाती हैं। इस सर्वशक्तिमान देवी की पूजा करने वाला पवित्र बनता है। इस दिन मां गौरी और भगवान शंकर की एक साथ पूजा की जाती है। इनकी पूजा करने से साधक को धन, वैभव, और सुख की प्राप्ति होती है। माता गौरी के भक्तों को पूर्ण समर्पण के साथ इनकी आराधना करनी चाहिए।

नवरात्रि के आठवें दिन का महत्व
माना जाता है कि जब देवी महागौरी की उत्पत्ति हुई थी तो उनकी आयु आठ वर्ष की थी इसलिए उनकी पूजा अष्टमी को की जाती है। नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरी की आराधना से सांसरिक मोह माया के कब्जे से मुक्ति मिलती है और साधक ख़ुद को पहचान पाता है। आपके जीवन से अपार दुःख दूर होते हैं, आपको सदाचार और आंतरिक शक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। आठवें दिन मां महागौरी साधक के सभी पापों को मिटाती हैं और शुद्धता, शांति और समृद्धि का प्रतीक देवी महागौरी साधक को ज्ञान का मार्ग दर्शाती हैं। [ये भी पढ़ें: नवरात्रि स्पेशल: छठें दिन देवी कात्यायनी की पूजा क्यों की जाती है]

पूजा की विधि
मां महागौरी की पूजा करने के लिए सर्वप्रथम कलश में विधमान सभी देवी-देवताओं को नमन करें। मां महागौरी की पूजा के लिए धूप-दीप आदि के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। मां को चना-हलवा और खोये से बने मिष्ठान का भोग लगाएं। मां को फूल अर्पण करें। इसके बाद देवी के मंत्रों का जाप करते वक्त उनके भव्य रुप में ध्यान लगाएं। भक्तों को देवी महा गौरी की पूजा शुद्ध मन करनी चाहिए।

पूजा का मंत्र

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्त्र महादेव प्रमोददा ||

अर्थ: जैसे श्वेत देवी महागौरी वृषभ की सवारी करती हैं, वह सफेद रंग के गहने के साथ सजी है, सफेद साड़ी में लिपटी देवी पवित्रता और शांति का प्रतीक हैं। [ये भी पढ़ें: नवरात्रि स्पेशल: पांचवे दिन देवी स्कंदमाता की पूजा का महत्व]

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