Navratri Speicial: सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा का महत्व

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navratri special significane of worshiping goddess kalratri on seventh day

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नवरात्रि के सातवें दिन या सप्तमी को नवदुर्गा के सातवें रुप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी कालरात्रि मां दुर्गा के सभी रुपों में से सबसे अधिक क्रोध वाली देवी है। इनका रंग कृष्ण(काला) है और मां का रुप भयानक है। देवी कालरात्रि को दानवों का नाश करने के लिए मां दुर्गा ने उत्पन्न किया था इसलिए उनकी आँखें क्रोध के कारण लाल रहती है और उनके हाथों में कटार है और उनकी जीभ लाल है। इनका पूजन काली मां के नाम से भी किया जाता है। मां काली गर्दभ की सवारी करती हैं। वह सभी बुराइयों, बुरी शक्तियों और सभी नकारात्मक विचारों और भयों पर विजय प्राप्त करने वाली देवी हैं। देवी कालरात्रि अपने भक्तों पर अपना आशीर्वाद रखती हैं और उनकी रक्षा करती हैं। आइए जानते हैं कि इनकी आराधना कैसे और क्यों की जाती है। [ये भी पढ़ें: नवरात्रि स्पेशल: छठें दिन देवी कात्यायनी की पूजा क्यों की जाती है]

Navratri Speicial: सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा क्यों की जाती है

इनकी पूजा क्यों की जाती है
नवरात्रि के सातवें दिन का महत्व
पूजा की विधि
पूजा का मंत्र
अर्थ

इनकी पूजा क्यों की जाती है
हालांकि, देवी कालरात्री का रुप बहुत भयानक है, लेकिन भक्तों के प्रति उनकी उदार कृपा है। सातवें दिन मां कालरात्री की पूजा करने से सुखदायी फल मिलता है। उनकी कृपा से भक्तों को शक्ति, ऊंचा पद और प्रतिष्ठित जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वह अपने भक्तों को दानवों और गलत लोगों के बुरे प्रभाव से बचाती हैं। इनकी आराधना से भक्तों को पूरी तरह से सुरक्षित और दीर्घ आयु मिलती है। मां कालरात्री की आराधना मानवजाति के जीवन से सभी नकारात्मक प्रभावों को नष्ट करने के लिए की जाती हैं। नवरात्री पूजा के सातवें दिन, सप्तमी उपवास में इस देवी को खुश करने के लिए उपवास करें।

नवरात्रि के सातवें दिन का महत्व
माँ हमें सिखाती हैं कि दु: ख, दर्द, हानि, विनाश और मृत्यु अपरिहार्य है और इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है। ये जीवन की सच्चाई हैं और इनसे इनकार करना व्यर्थ है। हमें अपने अस्तित्व और महत्व को स्वीकार करना चाहिए ताकि हम अपने अस्तित्व और अपनी क्षमता की पूर्णता को महसूस कर सकें। सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा करके हम अपने क्रोध पर विजय पाना सीखते हैं। कालरात्रि साधक को ज्ञान देती हैं कि अपने क्रोध का उपयोग स्वयं की सफलता के लिए कैसे करना है। [ये भी पढ़ें: नवरात्रि स्पेशल: पांचवे दिन देवी स्कंदमाता की पूजा का महत्व]

पूजा की विधि
अगर आप अष्टमी के दिन कंजक पूजा करते हैं तो सत्पमी का दिन आपके लिए आखिरी नवरात्र व्रत होता है। ऐसे में इस दिन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। आपको कालरात्रि से अपने सभी दु:खों को हरने के लिए और इच्छापूर्ति के लिए पूजा करनी चाहिए। शास्त्रों में वर्णित अनुष्ठानों के अनुसार, सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना करने के लिए सबसे पहले कलश में मौजूद सभी देवी-देवताओं, सभी ग्रहों की साथ में पूजा की जाती है। इसके बाद देवी कालरात्रि के स्वरुप को अपने मन में सोचकर या उनकी मूर्ति को केंद्र बनाकर ध्यान लगाएं। अब उनके मंत्रों का जाप करें।

पूजा का मंत्र
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ: हे मां! आप सभी जगह विराजमान है। कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध, हे अम्बे, आपको मेरा बार-बार नमस्कार है। मैं आपको प्रणाम करता हूं। [ये भी पढ़ें: नवरात्र स्पेशल: चौथे दिन देवी कुष्मांडा की पूजा का महत्व]

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